अध्याय 0: बिहार में शराबबंदी | बिहार क्राइम स्टोरी

बिहार में शराबबंदी पर विधानसभा बहस, पुलिस चेकपोस्ट और अवैध शराब के बाजार को दर्शाता कार्टून चित्र

यह कहानी पूर्णतः काल्पनिक है। बिहार में शराबबंदी से जुड़े संदर्भ कहानी की काल्पनिक पृष्ठभूमि का हिस्सा हैं | इसमें वर्णित सभी पात्र, घटनाएँ, संवाद एवं परिस्थितियाँ रचनात्मक कल्पना पर आधारित हैं। किसी वास्तविक व्यक्ति, राजनीतिक दल, सरकारी अधिकारी या संस्था से समानता मात्र संयोग है। यह कहानी किसी राजनीतिक विचारधारा, नीति या व्यक्ति के समर्थन अथवा विरोध का आधिकारिक वक्तव्य नहीं है।

पटना।

बिहार विधानसभा का मानसून सत्र।

दोपहर के करीब साढ़े बारह बजे सदन में शोर इतना बढ़ चुका था कि अध्यक्ष की लगातार बजती घंटी भी बेअसर लग रही थी।

सत्तापक्ष के कुछ विधायक अपनी सीटों से खड़े होकर विपक्ष की तरफ इशारा कर रहे थे। विपक्षी विधायक मेज थपथपा रहे थे।

बीच में माइक के सामने खड़े थे—विपक्ष के वरिष्ठ नेता विवेकानंद चौधरी।

सफेद कुर्ता-पायजामा, कंधे पर हल्का गमछा और हाथ में कुछ कागज।

वो चिल्ला नहीं रहे थे।

बल्कि यही बात उन्हें बाकी नेताओं से अलग कर रही थी।

“माननीय अध्यक्ष महोदय,” उन्होंने शांत आवाज में कहा, “मैं आज शराबबंदी के खिलाफ बोल रहा हूं।”

सदन में कुछ आवाजें उठीं।

विवेकानंद ने हाथ उठाकर उन्हें रोक दिया।

“लेकिन उससे पहले एक बात साफ कर दूं।”

उन्होंने मुख्यमंत्री अरविंद प्रताप सिंह की तरफ देखा।

“मैं ये नहीं कह रहा कि शराबबंदी का विचार गलत था।”

सदन थोड़ा शांत हुआ।

“जब यह फैसला लिया गया था, तब इसके पीछे कारण थे। महिलाओं की सुरक्षा। परिवारों की आर्थिक स्थिति। घरेलू हिंसा। सामाजिक बुराइयां।”

उन्होंने सामने रखे कागजों को सीधा किया।

“इनमें से कौन सा उद्देश्य गलत था?”

सत्तापक्ष की तरफ से कोई जवाब नहीं आया।

“एक भी नहीं।”

उन्होंने कहा।

“समस्या उद्देश्य में नहीं है। समस्या उस व्यवस्था में है जो उस उद्देश्य को जमीन पर लागू कर रही है।”

पीछे से एक विधायक चिल्लाया—

“तो शराब बिकने दें?”

विवेकानंद ने उसकी तरफ देखा।

“मैंने अभी तक ऐसा नहीं कहा।”

हल्की हंसी विपक्षी बेंच से आई।

विवेकानंद ने मुस्कुराए बिना कहा—

“हालांकि अगर आप लोग पांच मिनट और चिल्लाएंगे तो टीवी पर यही चलेगा कि मैंने कहा था।”

सदन में ठहाका गूंज गया।

मुख्यमंत्री के चेहरे पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं आई।

विवेकानंद ने अगला कागज उठाया।

“आज बिहार में शराब की बिक्री बंद है।”

उन्होंने कुछ पल रुककर पूछा—

“लेकिन क्या शराब बिहार में आना बंद हो गई?”

इस बार जवाब विपक्ष से नहीं आया।

कुछ सेकंड की चुप्पी के बाद सत्ता पक्ष की एक सीट से धीमी आवाज आई—

“नहीं।”

विवेकानंद ने सिर हिलाया।

“यही समस्या है।”

उन्होंने कहा—

“हमने शराब को खत्म नहीं किया। हमने शराब के कारोबार को कानून के बाहर धकेल दिया।”

अब उनकी आवाज में गंभीरता थी।

“और जब कोई बाजार कानून के बाहर चला जाता है, तो उसका नियंत्रण सरकार के हाथ में नहीं रहता।”

“वो उन लोगों के हाथ में चला जाता है जिनके लिए कानून पहले से ही कोई मायने नहीं रखता।”

उन्होंने एक और पन्ना उठाया।

“पड़ोसी राज्यों से शराब आ रही है।”

“सीमावर्ती जिलों में नेटवर्क बन रहे हैं।”

“छोटे तस्कर बड़े गिरोहों के लिए काम कर रहे हैं।”

“स्थानीय स्तर पर ऐसे लोग इस धंधे में उतर रहे हैं जिनका अपराध की दुनिया से कोई पुराना संबंध भी नहीं था।”

सदन में अब शोर कम हो चुका था।

“क्यों?”

उन्होंने खुद ही जवाब दिया।

“क्योंकि मांग अभी भी मौजूद है।”

उन्होंने कागज मेज पर रख दिया।

“और जहां मांग होती है, वहां बाजार बनता है।”

एक विधायक ने कहा—

“तो क्या सरकार हाथ खड़े कर दे?”

विवेकानंद ने उसकी तरफ देखा।

“नहीं। सरकार को बस ये मान लेना चाहिए कि दस साल बाद भी अगर समस्या वही है, तो शायद रणनीति बदलने का समय आ गया है।”

उन्होंने अगला पन्ना खोला।

“आज पुलिस क्या कर रही है?”

“चेकपोस्ट।”

“छापेमारी।”

“वाहनों की जांच।”

“गिरफ्तारी।”

“केस।”

“जब्ती।”

उन्होंने मुख्यमंत्री की तरफ देखा।

“और अगले दिन फिर वही।”

वो कुछ क्षण रुके।

“एक ट्रक पकड़ा जाता है।”

“दूसरा निकल जाता है।”

“एक ड्राइवर पकड़ा जाता है।”

“दूसरा तैयार रहता है।”

“एक गोदाम बंद होता है।”

“दूसरा खुल जाता है।”

उन्होंने कहा—

“हम बोतलें पकड़ रहे हैं।”

फिर आवाज धीमी की।

“लेकिन नेटवर्क नहीं।”

अब उन्होंने वह मुद्दा उठाया जिसे सदन में कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता था।

“जहरीली शराब।”

सदन अचानक शांत हो गया।

“जब कोई चीज पूरी तरह गैरकानूनी हो जाती है, लेकिन उसकी मांग खत्म नहीं होती, तो बाजार गायब नहीं होता।”

उन्होंने कहा—

“उसकी गुणवत्ता की गारंटी खत्म हो जाती है।”

कुछ पत्रकारों ने तेजी से नोट्स लिखे।

“लोग जहरीली शराब पीकर मरते हैं। परिवार बर्बाद होते हैं। फिर पुलिस आती है। कुछ लोगों को पकड़ती है। कुछ दिन खबर चलती है।”

उन्होंने कागज बंद कर दिया।

“फिर सब शांत।”

उनकी आवाज में पहली बार हल्का व्यंग्य था।

“बिहार में शायद हमारी सबसे सफल प्रशासनिक रणनीति यही है—समस्या को कुछ दिन खबर बनने देना और फिर उम्मीद करना कि जनता भूल जाएगी।”

सत्तापक्ष में नाराजगी फैल गई।

“अध्यक्ष महोदय!”

“ये सदन का अपमान है!”

अध्यक्ष ने हथौड़ा बजाया।

“चौधरी जी, विषय पर रहिए।”

विवेकानंद मुस्कुराए।

“मैं बिल्कुल विषय पर हूं, महोदय। विषय ही इतना बड़ा है कि सदन छोटा पड़ रहा है।”

विपक्षी बेंच से मेज थपथपाने की आवाज आई।

उन्होंने फिर गंभीर होकर कहा—

“बिहार को अभी क्या चाहिए?”

“स्कूल।”

“अस्पताल।”

“रोजगार।”

“उद्योग।”

“निवेश।”

“सड़कें।”

“और एक ऐसी पुलिस जो हर दिन अपराध से लड़ सके।”

उन्होंने नक्शे की तरफ इशारा किया।

“लेकिन हमारी पुलिस का एक बड़ा हिस्सा उन लोगों का पीछा कर रहा है जो दूसरे राज्यों से शराब लेकर बिहार में घुस रहे हैं।”

“क्योंकि राज्य की सीमाएं शराबबंदी से नहीं रुकतीं।”

मुख्यमंत्री ने पहली बार अपनी सीट पर हल्की हलचल की।

विवेकानंद ने उन्हें देख लिया।

लेकिन वो रुके नहीं।

“मैं ये नहीं कह रहा कि शराबबंदी ने समाज को कोई फायदा नहीं दिया।”

“मैं कह रहा हूं कि सरकार को ये जांचना चाहिए कि उस फायदे की कीमत क्या है।”

“पुलिस पर कितना बोझ पड़ा?”

“अदालतों पर कितना?”

“जहरीली शराब से कितनी जानें गईं?”

“तस्करी का नेटवर्क कितना बड़ा हुआ?”

“राज्य को कितना राजस्व नुकसान हुआ?”

“और सबसे जरूरी—क्या शराब की उपलब्धता वास्तव में खत्म हुई?”

उन्होंने आखिरी सवाल को दोहराया।

“क्या शराब की उपलब्धता वास्तव में खत्म हुई?”

कोई जवाब नहीं।

विवेकानंद ने फाइल बंद कर दी।

“मेरी मांग स्पष्ट है।”

उन्होंने कहा—

“पूर्ण शराबबंदी को तत्काल समाप्त किया जाए।”

सत्तापक्ष में हंगामा मच गया।

विवेकानंद ने हाथ उठाकर कहा—

“या कम से कम एक स्वतंत्र समीक्षा आयोग बनाया जाए।”

“आंकड़ों के आधार पर फैसला लिया जाए।”

“राजनीतिक नारे के आधार पर नहीं।”

फिर उन्होंने मुख्यमंत्री की तरफ देखा।

“मुख्यमंत्री जी ने शराबबंदी एक सामाजिक उद्देश्य के साथ लागू की थी।”

“लेकिन सरकार का काम सिर्फ सही फैसला लेना नहीं होता।”

एक विराम।

“सरकार का काम ये देखना भी होता है कि उस फैसले का जमीन पर क्या परिणाम निकला।”

वो अपनी सीट की तरफ बढ़े।

फिर अचानक रुक गए।

“क्योंकि मुख्यमंत्री जी…”

पूरा सदन उनकी तरफ देख रहा था।

“शराब बंद करना एक फैसला था।”

उन्होंने कहा—

“लेकिन उसे बंद रखने का सही कारण ढूंढना अब एक अलग फैसला है।”

वो बैठ गए।

सदन फिर शोर में डूब गया।

बाहर विधानसभा परिसर में पत्रकारों की भीड़ लग चुकी थी।

कैमरे चल रहे थे।

माइक आगे बढ़ रहे थे।

“चौधरी जी! क्या आपकी पार्टी शराबबंदी खत्म करेगी?”

“क्या आप मानते हैं कि सरकार विफल रही है?”

“क्या आपके पास शराबबंदी के खिलाफ नया डेटा है?”

विवेकानंद सीढ़ियां उतरते हुए रुके।

एक पत्रकार ने पूछा—

“सर, मुख्यमंत्री कह रहे हैं कि शराबबंदी से समाज को फायदा हुआ है।”

विवेकानंद ने उसकी तरफ देखा।

“हो सकता है।”

पत्रकार कुछ पल चुप रहा।

विवेकानंद मुस्कुराए।

“लेकिन राजनीति में ‘हो सकता है’ काफी नहीं होता।”

फिर उन्होंने कैमरे की तरफ देखा।

“फैसले के लिए सबूत चाहिए।”

वो गाड़ी की तरफ बढ़ गए।

पीछे उनके निजी सहायक ने पूछा—

“सर, अच्छा गया।”

विवेकानंद ने बिना उसकी तरफ देखे पूछा—

“क्लिप भेजी?”

“कौन सी?”

“जहां मैंने शराबबंदी खत्म करने वाली बात कही थी।”

“जी।”

“तीनों बड़े चैनल?”

“जी।”

विवेकानंद गाड़ी में बैठ गए।

“अच्छा। अब बाकी भाषण की जरूरत नहीं।”

गाड़ी आगे बढ़ गई।

राजनीति में कभी-कभी पूरी बात जनता तक पहुंचाना जरूरी नहीं होता।

बस वही हिस्सा पहुंचाना होता है जिसे जनता याद रखे।


उसी शाम पटना के लगभग हर न्यूज़ चैनल पर एक ही बहस चल रही थी।

“क्या बिहार में शराबबंदी की समीक्षा का समय आ गया है?”

कहीं विवेकानंद चौधरी के भाषण की क्लिप चल रही थी।

कहीं सरकार के प्रवक्ता शराबबंदी के फायदे गिना रहे थे।

कहीं अर्थशास्त्री राजस्व की बात कर रहे थे।

कहीं महिला संगठनों की राय दिखाई जा रही थी।

सोशल मीडिया पर दो हैशटैग एक-दूसरे से लड़ रहे थे।

#शराबबंदी_बचाओ

और

#शराबबंदी_हटाओ

लेकिन इन सबके बीच एक खबर धीरे-धीरे अपना आकार ले रही थी।

सीमावर्ती जिलों से शराब की बरामदगी बढ़ रही थी।

ट्रकों में।

कारों में।

एम्बुलेंस में।

दूध के टैंकरों में।

कभी सब्जियों के नीचे।

कभी शव वाहन में।

पुलिस पकड़ रही थी।

हर दिन।

लेकिन जितनी शराब पकड़ी जा रही थी, उससे कहीं ज्यादा राज्य में पहुंच रही थी।

और अब सवाल सिर्फ ये नहीं था कि शराब बिहार में कैसे आ रही थी।

सवाल ये था—

उसे रोक क्यों नहीं पा रहे थे?

रात के करीब साढ़े ग्यारह बजे।

पटना पुलिस मुख्यालय की एक मंजिल पर अब भी रोशनी जल रही थी।

कमरे के अंदर बिहार के पुलिस महानिदेशक राघवेंद्र प्रसाद अकेले बैठे थे।

टेलीविजन पर वही बहस चल रही थी।

“क्या शराबबंदी बिहार के विकास में बाधा बन रही है?”

राघवेंद्र ने टीवी बंद कर दिया।

कमरे में सन्नाटा छा गया।

उन्होंने सामने रखी तीन फाइलों को देखा।

फिर फोन उठाया।

“कल सुबह दस बजे मीटिंग रखिए।”

दूसरी तरफ से आवाज आई—

“जी सर।”

राघवेंद्र कुछ पल चुप रहे।

फिर बोले—

“सिर्फ शराब के केस लेकर मत आइएगा।”

“सर?”

“मुझे समाधान चाहिए।”

उन्होंने फोन रख दिया।

बाहर पटना सो रहा था।

लेकिन बिहार में एक समस्या जाग चुकी थी।

और अगली सुबह वह समस्या सीधे पुलिस मुख्यालय के दरवाजे तक पहुंचने वाली थी।

अगले अध्याय में कहानी आगे बढ़ेगी
[← अध्याय 1 पढ़ें]

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top