अध्याय 1: जो समस्या दरवाजे तक पहुंच गई | बिहार क्राइम स्टोरी

बिहार क्राइम स्टोरी अध्याय 1 का कवर, जिसमें मुख्यमंत्री, पुलिस मुख्यालय और सस्पेंडेड अधिकारियों की फाइल दिखाई गई है

अगली सुबह मुख्यमंत्री कार्यालय में सामान्य से ज्यादा शांति थी।

वह शांति जो अक्सर किसी बड़े तूफान से पहले आती है।

मुख्यमंत्री अरविंद प्रताप सिंह अपनी मेज के पीछे बैठे थे।

सामने बिहार के पुलिस महानिदेशक राघवेंद्र प्रसाद।

कमरे में मुख्यमंत्री के प्रधान सचिव भी मौजूद थे, लेकिन पिछले पंद्रह मिनट से उन्होंने एक शब्द नहीं कहा था।

मुख्यमंत्री के सामने कुछ कागज रखे थे।

उन्होंने उनमें से एक उठाया।

“ये कल की रिपोर्ट है?”

“जी।”

“सीमा से शराब की बरामदगी?”

“जी।”

“और नीचे क्या लिखा है?”

राघवेंद्र चुप रहे।

मुख्यमंत्री ने खुद पढ़ा।

“पिछले महीने की तुलना में पैंतीस प्रतिशत ज्यादा।”

उन्होंने कागज मेज पर रख दिया।

“बहुत बढ़िया।”

आवाज में प्रशंसा नहीं थी।

“हम शराब पकड़ने में रिकॉर्ड बना रहे हैं।”

राघवेंद्र ने कुछ कहने की कोशिश की।

“सर, सीमा वाले जिलों में हमने—”

मुख्यमंत्री ने हाथ उठा दिया।

“मुझे पता है आपने क्या किया है।”

कमरे में फिर शांति हो गई।

“मैं ये पूछ रहा हूं कि जो नहीं किया जा सका, वो क्यों नहीं किया गया?”

राघवेंद्र ने सीधा जवाब दिया।

“सर, नेटवर्क बहुत बड़ा है।”

“कितना बड़ा?”

“कई जिलों में फैला हुआ है।”

“तो?”

“हम लगातार कार्रवाई कर रहे हैं।”

मुख्यमंत्री कुछ क्षण उन्हें देखते रहे।

“राघवेंद्र जी, कार्रवाई और समाधान में अंतर होता है।”

DGP चुप रहे।

मुख्यमंत्री ने दूसरा कागज उठाया।

“ये देखिए। विपक्ष कल विधानसभा में क्या बोल रहा था।”

“जी।”

“और आज सुबह क्या छपा है।”

उन्होंने अखबार उनकी तरफ सरका दिया।

पहले पन्ने पर मोटे अक्षरों में लिखा था—

“शराबबंदी पर सरकार घिरी, पुलिस की रणनीति पर उठे सवाल”

नीचे दूसरी खबर थी—

“बिहार में शराब की तस्करी रोकने में प्रशासन नाकाम?”

मुख्यमंत्री ने अखबार पर उंगली रखी।

“ये सिर्फ विपक्ष नहीं बोल रहा।”

“जनता भी बोल रही है।”

राघवेंद्र ने धीरे से कहा—

“सर, हम पूरी कोशिश कर रहे हैं।”

मुख्यमंत्री कुछ सेकंड उन्हें देखते रहे।

फिर बोले—

“यही बात आप मीडिया को भी बता दीजिए।”

राघवेंद्र समझ गए।

यह बातचीत अब समाप्त हो चुकी थी।

लेकिन मुख्यमंत्री ने उन्हें जाने नहीं दिया।

“एक बात और।”

राघवेंद्र रुक गए।

“मुझे शराब की बोतलें नहीं चाहिए।”

“सर?”

“मुझे वो लोग चाहिए जो इन्हें बिहार तक पहुंचा रहे हैं।”

उन्होंने कहा—

“आप हर रोज ट्रक पकड़ेंगे, कार पकड़ेंगे, ड्राइवर पकड़ेंगे…”

वो कुछ पल रुके।

“और अगले दिन दूसरा ट्रक आ जाएगा।”

मुख्यमंत्री कुर्सी से पीछे टिक गए।

“मुझे नेटवर्क तोड़ना है।”

फिर उनकी आवाज थोड़ी कठोर हो गई।

“और अगर पुलिस ऐसा नहीं कर सकती…”

वाक्य अधूरा छोड़ दिया गया।

उसकी जरूरत भी नहीं थी।

राघवेंद्र ने सिर हिलाया।

“समझ गया, सर।”

“उम्मीद है।”

पुलिस मुख्यालय

सुबह के दस बजकर सात मिनट।

बिहार पुलिस मुख्यालय के कॉन्फ्रेंस रूम में सात अधिकारी बैठे थे।

DGP के सामने प्रोजेक्टर पर एक स्लाइड लगी थी—

STRATEGY FOR CURBING ILLEGAL LIQUOR TRAFFICKING

राघवेंद्र प्रसाद ने कमरे में नजर दौड़ाई।

“चलिए।”

सबसे पहले IG Operations ने अपनी फाइल खोली।

“सर, हमारा सुझाव है कि सीमा पर चेकिंग को तीन गुना किया जाए।”

“कितने चेकपोस्ट?”

“वर्तमान से लगभग दोगुने।”

“आदमी?”

“लगभग आठ सौ अतिरिक्त।”

राघवेंद्र ने पूछा—

“आठ सौ आदमी कहां से आएंगे?”

अधिकारी चुप हो गए।

“ठीक है। दूसरा।”

एक DIG ने कहा—

“सर, हम सभी जिलों में स्पेशल ड्राइव चला सकते हैं। अगले पंद्रह दिनों तक लगातार छापेमारी।”

“और पंद्रह दिन बाद?”

“फिर आवश्यकता के अनुसार…”

“नहीं।”

उन्होंने अगली फाइल की तरफ देखा।

“और?”

एक अधिकारी ने कहा—

“सर, इंटेलिजेंस नेटवर्क मजबूत करना होगा।”

“कैसे?”

“मुखबिर बढ़ाने होंगे।”

“कितने?”

“सर…”

“और उन्हें भुगतान कौन करेगा?”

फिर चुप्पी।

एक युवा अधिकारी ने धीरे से कहा—

“सर, तकनीकी निगरानी बढ़ाई जा सकती है। फोन पैटर्न, वाहन मूवमेंट, डिजिटल पेमेंट…”

राघवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

“ये किया जा रहा है।”

“जी सर।”

“और?”

अधिकारी रुक गया।

“बस?”

“जी।”

राघवेंद्र ने कुर्सी पर पीछे टिकते हुए कहा—

“तो फिर हम वही कर रहे हैं जो पिछले तीन साल से कर रहे हैं।”

कोई जवाब नहीं।

उन्होंने प्रोजेक्टर की तरफ देखा।

“हमारे पास छापेमारी है।”

“चेकपोस्ट हैं।”

“मुखबिर हैं।”

“इंटेलिजेंस है।”

“साइबर सेल है।”

उन्होंने स्क्रीन की तरफ इशारा किया।

“फिर भी शराब आ रही है।”

कमरे में बैठे किसी अधिकारी के पास इसका जवाब नहीं था।

राघवेंद्र ने फाइल बंद कर दी।

“मुझे नई चीज चाहिए।”

“पुरानी चीज को नया नाम देकर मत लाइए।”


उसी समय पुलिस मुख्यालय के बाहर पत्रकारों की भीड़ बढ़ने लगी थी।

कल विधानसभा में जो हुआ था, उसका असर आज टीवी चैनलों पर दिखाई दे रहा था।

एक चैनल की OB van मुख्यालय के बाहर खड़ी थी।

दूसरे चैनल का रिपोर्टर कैमरे के सामने खड़ा था।

“बिहार पुलिस पर लगातार सवाल उठ रहे हैं…”

दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर क्लिप चल रही थी।

“DGP को CM की फटकार!”

“शराबबंदी पर बिहार सरकार की मुश्किलें बढ़ीं!”

“क्या सरकार शराबबंदी वापस लेगी?”

और एक चैनल ने तो बहस का शीर्षक ही रख दिया—

“शराबबंदी या शराब तस्करीबंदी?”

राघवेंद्र प्रसाद ने अपने कमरे की खिड़की से बाहर देखा।

उन्हें राजनीति समझ आती थी।

उन्हें मीडिया भी समझ आता था।

लेकिन उन्हें सबसे ज्यादा डर उस चीज से लगता था जिसे कोई आंकड़ा नहीं पकड़ सकता था।

जनता का धैर्य।

अगर लोग कानून को मानना बंद कर दें, तो पुलिस के पास सिर्फ डंडा बचता है।

और डंडे से कानून की इज्जत नहीं बनती।

सिर्फ डर बनता है।


अगली सुबह।

पटना पुलिस मुख्यालय।

राघवेंद्र प्रसाद अपनी गाड़ी से उतरे।

गेट से अंदर आते ही एक युवक उनकी तरफ तेजी से बढ़ा।

“सर!”

सुरक्षाकर्मी तुरंत आगे आए।

“सर, दो मिनट!”

राघवेंद्र रुके।

युवक के हाथ में कैमरा नहीं था।

सिर्फ एक फाइल थी।

“आप पत्रकार हैं?”

“जी सर।”

“नाम?”

“नीरज सिन्हा।”

“क्या चाहिए?”

नीरज ने जल्दी से फाइल आगे बढ़ाई।

“सर, मेरे मामा पुलिस में थे।”

राघवेंद्र ने फाइल नहीं ली।

“थे?”

“जी। अभी सस्पेंड हैं।”

“तो?”

“सर, मैं उनके मामले में आपसे मिलना चाहता हूं।”

राघवेंद्र ने घड़ी देखी।

“अपॉइंटमेंट लिया है?”

“नहीं सर।”

“तो फिर ऑफिस में आवेदन दीजिए।”

वो आगे बढ़ने लगे।

नीरज ने पीछे से कहा—

“सर, जिला SP ने उन्हें सस्पेंड किया है।”

राघवेंद्र रुक गए।

उन्होंने पीछे मुड़कर देखा।

“किस जिले के?”

“सारण।”

राघवेंद्र ने कुछ सोचा।

“नाम?”

“विवेक सिन्हा। इंस्पेक्टर विवेक सिन्हा।”

नाम सुनते ही राघवेंद्र की चाल थोड़ी धीमी हुई।

उन्हें नाम याद था।

विवेक सिन्हा।

सख्त अधिकारी।

थोड़ा असुविधाजनक।

और शायद इसी वजह से कुछ लोगों के लिए बहुत सुविधाजनक।

“क्यों सस्पेंड हुए?”

नीरज ने फाइल खोली।

“सर, ड्यूटी में लापरवाही।”

राघवेंद्र ने भौंहें सिकोड़ लीं।

“और?”

“बस यही लिखा है।”

“आपको क्या लगता है?”

नीरज हिचकिचाया।

“मुझे लगता है कि उन्होंने किसी गलत आदमी को पकड़ लिया था।”

राघवेंद्र ने उसे देखा।

“किसे?”

“यही नहीं पता सर।”

“और आपको कैसे पता कि गलत आदमी को पकड़ लिया?”

नीरज कुछ पल चुप रहा।

फिर बोला—

“क्योंकि जिस आदमी को उन्होंने पकड़ा था…”

उसने फाइल से एक कागज निकाला।

“…वो अब बाहर है।”

राघवेंद्र ने कागज लिया।

एक नाम था।

उन्होंने पढ़ा।

चेहरा बिल्कुल स्थिर रहा।

लेकिन उनकी आंखों में हल्का बदलाव आया।

“आप पत्रकार हैं?”

“जी।”

“फिर पुलिस के मामले में क्यों पड़े हैं?”

नीरज मुस्कुराया।

“क्योंकि पत्रकार होने के बाद भी रिश्तेदार तो मेरा ही है, सर।”

राघवेंद्र के चेहरे पर पहली बार हल्की मुस्कान आई।

बहुत हल्की।

“आपको पता है पुलिस में सस्पेंशन का मतलब क्या होता है?”

“जी।”

“क्या?”

“आदमी नौकरी में रहता है…”

नीरज ने कहा,

“…लेकिन काम में नहीं।”

राघवेंद्र ने उसकी तरफ देखा।

इस बार मुस्कान गायब थी।

क्योंकि वह वाक्य उन्हें अच्छा नहीं लगा।

क्योंकि वह सच था।


वो अपने ऑफिस की तरफ बढ़े।

दरवाजे तक पहुंचकर अचानक रुक गए।

“विवेक सिन्हा की पूरी सर्विस फाइल मेरे कमरे में भेजिए।”

पीछे चल रहे अधिकारी ने चौंककर पूछा—

“सर?”

“पूरी।”

“जी सर।”

राघवेंद्र अंदर चले गए।

दरवाजा बंद हुआ।

उन्होंने मेज पर पड़ी फाइलों को देखा।

सारण।

सीवान।

गोपालगंज।

चंपारण।

किशनगंज।

कटिहार।

मुजफ्फरपुर।

हर जगह वही कहानी।

शराब पकड़ी जा रही थी।

लोग पकड़े जा रहे थे।

केस दर्ज हो रहे थे।

लेकिन नेटवर्क नहीं टूट रहा था।

फिर उन्हें मुख्यमंत्री की बात याद आई।

“मुझे वो लोग चाहिए जो इन्हें बिहार तक पहुंचा रहे हैं।”

राघवेंद्र ने आंखें बंद कीं।

कुछ सेकंड तक सोचते रहे।

फिर उन्होंने फोन उठाया।

“कार्मिक विभाग से पिछले पांच साल में शराब से जुड़े मामलों में सस्पेंड हुए पुलिस अधिकारियों की सूची मंगाइए।”

दूसरी तरफ से आवाज आई—

“सर, कितने जिलों की?”

राघवेंद्र ने खिड़की से बाहर देखा।

“पूरे बिहार की।”

उन्होंने फोन रख दिया।

उन्हें अभी नहीं पता था कि उन्होंने क्या शुरू किया है।

उन्हें सिर्फ इतना पता था—

जिस पुलिस से वो शराब का नेटवर्क नहीं तोड़ पा रहे थे, शायद उस पुलिस की जरूरत ही नहीं थी।

उन्हें उन लोगों की जरूरत थी…

जिन्हें पुलिस ने खुद छोड़ दिया था।

अगले अध्याय में कहानी आगे बढ़ेगी।
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